देश भर के शिव भक्त 30 जुलाई, 2019 को श्रावण शिवरात्रि मनाएंगे। जानिए श्रावण या सावन शिवरात्रि में रुद्राभिषेक का क्या महत्व होता है।

श्रावण या सावन शिवरात्रि में रुद्राभिषेक का महत्व


सावन का महीना चल रहा है। यह महीना भक्तों के लिए बहुत खास होता है। भगवान शिव सभी के पसंदीदा भगवान हैं। यह वो है जो एक सरल जीवन जीते है, एक स्वतंत्र मन के साथ नृत्य करते है और अपने अनुयायियों से प्यार करते है। श्रावण का पूरा महीना भगवान शिव को समर्पित होता है।

देश भर के शिव भक्त 30 जुलाई, 2019 को श्रावण शिवरात्रि मनाएंगे। जबकि फरवरी / मार्च के महीने में यानि फाल्गुन के हिंदू महीने में आने वाली शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहा जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, शिवरात्रि हर महीने आती है, लेकिन महा शिवरात्रि और सावन शिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन सावन या श्रावण के महीने में आने वाली शिवरात्रि का विशेष महत्व है। इस दिन पूजन का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि अगर शिव की पूजा विधि-विधान से की जाए तो हर मनोकामना पूरी होती है। इस दिन भगवान शिव की पूजा से मोक्ष की प्राप्ति होती है, कई यज्ञों का फल प्राप्त होता है। जीवन में सुख- समृद्धि की कोई कमी नहीं होती। शिवरात्रि में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं। इस महीने रुद्राभिषेक करने से भक्तों के समस्त पापों का नाश हो जाता है।


भगवान शिव को रुद्र क्यों कहा जाता है?


श्रावण या सावन शिवरात्रि में रुद्राभिषेक का महत्व

रुद्र भगवान शिव का ही एक और नाम है। जैसे महादेव, शंकर, भोले नाथ शिव और इसी तरह रुद्र भगवान शिव के नाम से बेहद प्रसिद्ध हैं। रुद्र' शब्द का प्रयोग वेदों में किया गया है। रुद्र का अर्थ होता है टेम्पेस्ट या हिंसक तूफान। रुद्र भगवान शिव के विनाशकारी स्वभाव पर केंद्रित है। भगवान शिव सौम्य और आक्रामक दोनों हैं। वह क्षमाशील और निर्दयी है। वह सब कुछ है। वह ही आरंभ है और वह ही स्वयं अंत है। उनके भक्त उन्हें इस तरह देखते हैं।

कुछ दार्शनिक और आध्यात्मिक विशेषज्ञों का मानना ​​है कि रुद्र तांडव नृत्य के कारण भगवान शिव को रुद्र कहा जाता है। यह माना जाता है कि एक मजबूत, निडर और क्रोधी शिव श्मशान में रुद्र तांडव नृत्य करते हैं। वह अजेय और उग्र है।

एक अन्य कहानी कहती है कि रुद्र नाम 11 रुद्रों से जुड़ा है जो भगवान शिव द्वारा बनाए गए थे। एक बार, भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव से कुछ दिलचस्प प्राणी बनाने का अनुरोध किया। उन्होंने एकरसता की शिकायत की जो उन्हें साधारण प्राणी बनाने से मिली। वह असाधारण प्राणी चाहते थे।

भगवान शिव हमेशा ही दयालु रहे हैं। उन्होंने भगवान ब्रह्मा के अनुरोध को माना और 11 अमर जीवों को बनाया:

कपाली, पिंगला, भीम, विरुपाक्ष, विलोहिता, अजेशा, शवासन, शास्ता, शंभू, चंदा और, ध्रुव।

भगवान शिव ने 11 रुद्रों की रचना की इसलिए उन्हें रुद्र नाम से संबोधित किया गया।


रुद्राभिषेक का महत्व

श्रावण या सावन शिवरात्रि में रुद्राभिषेक का महत्व

एक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव सपरिवार वृषभ पर बैठकर विहार कर रहे थे। उसी समय माता पार्वती ने मृत्युलोक में रुद्राभिषेक कर्म में प्रवृत्त लोगों को देखा तो भगवान शिव से जिज्ञासावश पूछा कि हे नाथ! मृत्युलोक में इस तरह आपकी पूजा क्यों की जाती है? तथा इसका फल क्या है? भगवान शिव ने कहा- हे प्रिये! जो मनुष्य शीघ्र ही अपनी कामना पूर्ण करना चाहता है वह आशुतोष स्वरूप मेरा विविध द्रव्यों से विविध फल की प्राप्ति हेतु अभिषेक करता है। जो मनुष्य शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक करता है उसे मैं प्रसन्न होकर शीघ्र मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ। जो व्यक्ति जिस कामना की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक करता है वह उसी प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करता है।


रुद्राभिषेक पूजा क्या है?

रुद्राभिषेक पूजा सर्वोपरि है। यह एक अनुष्ठान के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हिंदू धर्म में सबसे अच्छे, शुद्ध और सम्मोहक अनुष्ठानों में से एकमानी जाती है। रुद्राभिषेक पूजा में भगवान शिव की पूजा की जाती है, उन्हें पवित्र स्नान के साथ फूल और आवश्यक सामग्री अर्पित की जाती है।


रुद्राभिषेक पूजा कब होती है?

रुद्राभिषेक पूजा श्रावण के महीने में होती है। यह हिंदू धर्म के अनुसार बारिश के महीने जुलाई-अगस्त में होती है।


श्रावण या सावन शिवरात्रि में रुद्राभिषेक का महत्व


रुद्राभिषेक पूजा के विशेष प्रकार

कई शिवभक्तों का मानना है कि एक नियमित पूजा या एक साधारण पूजा करने के बजाय, अगर एक पूजा विशेष रूप से की जाती है, तो भगवान से प्यार और आशीर्वाद प्राप्त करने की अधिक संभावना होती है। आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे हैं उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए इसका उल्लेख शिव पुराण में किया गया है। वहीं से उद्धृत कर हम आपको यहां जानकारी दे रहे हैं-

यदि वर्षा चाहते हैं तो जल से रुद्राभिषेक करें।

रोग और दुःख से छुटकारा चाहते हैं तो कुशा जल से अभिषेक करना चाहिए।

मकान, वाहन या पशु आदि की इच्छा है तो दही से अभिषेक करें।

लक्ष्मी प्राप्ति और कर्ज से छुटकारा पाने के लिए गन्ने के रस से अभिषेक करें।

धन में वृद्धि के लिए जल में शहद डालकर अभिषेक करें।

मोक्ष की प्राप्ति के लिए तीर्थ से लाये गये जल से अभिषेक करें।

बीमारी को नष्ट करने के लिए जल में इत्र मिला कर अभिषेक करें।

पुत्र प्राप्ति, रोग शांति तथा मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए गाय के दुग्ध से अभिषेक करें।

ज्वर ठीक करने के लिए गंगाजल से अभिषेक करें।

सद्बुद्धि और ज्ञानवर्धन के लिए दुग्ध में चीनी मिलाकर अभिषेक करें।

वंश वृद्धि के लिए घी से अभिषेक करना चाहिए।

शत्रु नाश के लिए सरसों के तेल से अभिषेक करें।

पापों से मुक्ति चाहते हैं तो शुद्ध शहद से रुद्राभिषेक करें।


ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है। परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है। किन्तु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है।


रूद्राभिषेक पूजा के लिए आवश्यक सामग्री

विल्व पत्र -108, धतूरा, दीपक, घी, दही, शहद, चंदन, सिंदूर, धूप,  कपूर, पान के पत्ते, मेवा, गुलाबजल, पंचामृत, गन्ना का रस, गंगाजल, कलावा, वस्त्र -इच्छानुसार, यगोपवित्र, उपवस्त्र -इच्छानुसार, सुगन्धित द्रव्य, रोली, पुष्पमाला, पुष्प (चमेली, कमल पुष्प, शंख पुष्प, करवीर और दुपहरिया पुष्प, हरसिंगार, बेला, कनेर, जूही, अलसी, धतूरे के फूलों ) नैवेद्य-इच्छानुसार, चन्दन की लकडी, ऋतुफल-पांच, ताम्बूल-पूगीफल, आरती के लिये कपूर और अन्य सुगंधित पदार्थ जिन्हें आप अर्पण करना चाहते हैं शामिल हैं।


रूद्राभिषेक पूजा प्रक्रिया

श्रावण या सावन शिवरात्रि में रुद्राभिषेक का महत्व

रुद्राभिषेक की पूजा को करने के पहले विस्तृत तैयारी की आवश्यकता होती है। भगवान शिव, माता पार्वती, अन्य देवी-देवताओं और नवग्रहों के लिए आसन तैयार करते हैं। पूजा शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा करके आशीर्वाद मांगा जाता है। भक्त संकल्प लेते हैं या पूजा करने का उल्लेख बताते हैं। सभी के पूजन के बाद शिवलिंग की पूजा की जाती है। प्रभावशाली मंत्रो और शास्त्रोक्त विधि से विद्वान ब्राह्मण द्वारा पूजा को संपन्न करवाया जाता है। इस पूजा से जीवन में आने वाले संकटो एवं नकारात्मक ऊर्जा से छुटकारा मिलता है।

पूजा की शुरुआत शिवलिंग पर गंगाजल डालने से होती है और गंगा जल के साथ हर तरह के अभिषेक के बीच शिवलिंग को स्नान कराने के बाद अभिषेक के लिए आवश्यक सभी सामग्री जैसे घी, दही, दूध आदि शिवलिंग पर अर्पण किया जाता है। पूजा आग पर एक होमा प्रदर्शन से शुरू होती है और यह पुजारी या विद्वान ब्राह्मण द्वारा की जाती है। इसमें शिवलिंग को उत्तर दिशा में रखते हैं। भक्त शिवलिंग के निकट पूर्व दिशा की ओर मुंख करके बैठते हैं। 


श्रावण या सावन शिवरात्रि में रुद्राभिषेक का महत्व


रुद्राभिषेक में शुक्ल यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों का पाठ करते हैं। अंत में, भगवान को वस्त्र, मिष्ठान और अन्‍य सामग्रियां अर्पित करके आरती की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में शिवलिंग पर गिरने वाली धार बन्द नहीं होनी चाहिए। अभिषेक से एकत्रित गंगा जल को भक्तों पर छिड़का जाता है और पीने के लिए भी दिया जाता है, जिसे माना जाता है कि सभी पाप और बीमारियां दूर हो जाती हैं। रूद्राभिषेक की संपूर्ण प्रक्रिया में रूद्राम या ' ॐ नम: शिवाय' का जाप  चलता रहना चाहिए।

शिवरात्रि पर ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप और शिवलिंग का अभिषेक करना भी बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा कहते हैं कि शिव मंत्र का जाप करने से भोले शंकर हमारे जीवन के सारे दुखों को हर लेते हैं। शिव कृपा से आपकी सभी मनोकामना जरूर पूरी होंगी तो आपके मन में जैसी कामना हो वैसा ही रुद्राभिषेक करिए और अपने जीवन को शुभ ओर मंगलमय बनाइए।


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Sumegha Bhatnagar

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